गणेश उत्सव: बाल गंगाधर तिलक द्वारा सार्वजनिक परंपरा की शुरुआत


गणेश उत्सव और बाल गंगाधर तिलक का योगदान

परिचय
भारत में गणेश चतुर्थी का पर्व आज भव्य रूप से पूरे देश में मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस उत्सव को सार्वजनिक रूप से मनाने की परंपरा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने शुरू की थी? उन्होंने इस पर्व को सामाजिक और राजनीतिक चेतना का माध्यम बनाया।


गणेश चतुर्थी का महत्व

गणेश चतुर्थी भगवान श्री गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। हिंदू धर्म में गणपति को विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता माना जाता है। लोग अपने घरों और पंडालों में गणेश की मूर्ति स्थापित कर पूजा-अर्चना करते हैं।


तिलक द्वारा सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत

  • बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में पहली बार सार्वजनिक गणेशोत्सव का आयोजन किया।
  • उस समय अंग्रेजों ने बड़े समूहों में भारतीयों के एकत्र होने पर रोक लगा रखी थी।
  • तिलक ने धार्मिक उत्सव को सामाजिक एकता और स्वतंत्रता आंदोलन का स्वरूप दिया।
  • इस आयोजन से जनता एक साथ आती थी, राष्ट्रवादी विचारों का प्रसार होता था और अंग्रेज़ों के खिलाफ आवाज़ बुलंद की जाती थी।

प्रभाव

  1. सामाजिक एकता – जाति और वर्ग से ऊपर उठकर लोग एक साथ आए।
  2. राजनीतिक चेतना – लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए प्रेरित किया गया।
  3. सांस्कृतिक जागरण – नाटक, गीत, भाषण और कीर्तन के माध्यम से भारतीय संस्कृति का प्रचार हुआ।

आज का गणेश उत्सव

आज गणेश उत्सव केवल महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि पूरे भारत में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। मुंबई, पुणे, नागपुर जैसे शहरों में लाखों लोग गणेश मंडलों और झांकियों में शामिल होते हैं। तिलक द्वारा शुरू की गई यह परंपरा अब विश्वभर में बसे भारतीयों तक पहुँच चुकी है।


निष्कर्ष

गणेश उत्सव केवल धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई और सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इसे जनता की आवाज़ और स्वतंत्रता के आंदोलन का साधन बनाया, जिसे आज भी पूरे भारत में गर्व और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।


Leave a Comment